दिल्ली का 'असली बॉस' कौन है, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुना दिया है.
जस्टिस एके सीकरी ने कहा है कि प्रशासनिक मामलों से जुड़े सारे अधिकार दिल्ली सरकार के पास हैं जबकि क़ानून, पुलिस और जमीन से जुड़े मामलों में यह अधिकार केंद्र के पास हैं.
जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण की बेंच ने सभी पक्षों को सुनने के बाद पिछले साल नवंबर के महीने में अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.
सीकरी ने अपने फ़ैसले में कहा है कि निदेशक स्तर की नियुक्ति दिल्ली सरकार कर सकती है.
वहीं जस्टिस भूषण का फ़ैसला इसके उलट है. उन्होंने अपने फ़ैसले में कहा है कि दिल्ली सरकार के पास सारी कार्यकारी शक्तियां नहीं है. अधिकारियों के ट्रांसफर पोस्टिंग के अधिकार उपराज्यपाल के पास हैं.
दो बेंच की पीठ के फ़ैसले में मतभेद होने के बाद अब असहमति वाले मुद्दों को तीन जजों की बेंच के पास भेजा जाएगा.
पिछले हफ्ते दिल्ली सरकार ने पीठ से समक्ष मामले में जल्द फ़ैसला सुनाने की अपील की थी. सरकार का कहना था कि उन्हें प्रशासन चलाने में कई तरह की दिक्कतें आ रही हैं.
पिछले साल अगस्त में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक अध्यक्ष है. कोर्ट ने कहा था कि उपराज्यपाल के लिए दिल्ली के मंत्रिमंडल की हर सलाह मानना अनिवार्य नहीं है.
दिल्ली सरकार ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.
दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच प्रशासनिक फ़ैसले पर मतभेद रहे हैं. सरकार का कहना है कि उपराज्यपाल उनके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करते हैं जिससे उन्हें सरकार चलाने में दिक्कतें आती हैं.
विवाद नियुक्ति और स्थानांतरण को लेकर भी है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना फ़ैसला सुनाया है.
अरविंद केजरीवाल पहले मुख्यमंत्री नहीं हैं जिन्होंने इस मुद्दे पर क़ानूनी लड़ाई लड़ने का फ़ैसला किया.
इससे पहले साल साल 1952 में जब दिल्ली की गद्दी पर कांग्रेस पार्टी के नेता ब्रह्म प्रकाश मुख्यमंत्री थे तो उस समय भी चीफ़ कमिश्नर आनंद डी पंडित के साथ एक लंबे समय तक तनातनी चलती रही.
इसके बाद मुख्यमंत्री को 1955 में इस्तीफ़ा देना पड़ा और 1956 में दिल्ली से राज्य का दर्जा छीन लिया गया.
इसके बाद दिल्ली में सरकार बनाने वाली बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अपने-अपने समय पर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग उठाती रही हैं.
यही नहीं साल 2003 में दिल्ली को पूर्ण राज्य दिलाने के लिए संसद में संशोधन प्रस्ताव तक पेश किया गया.
वाजपेयी सरकार की ओर से तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने संसद में संशोधन प्रस्ताव रखा.
इसमें पुलिस और क़ानून व्यवस्था को केंद्र के अधीन रखने की बात की गई.
लेकिन संसद का कार्यकाल पूरा होने के साथ ही ये विधेयक अपने आप ही रद्द हो गया.
कांग्रेस नेता और तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं शीला दीक्षित ने भी अपने समय में ऐसी ही कोशिशें की थीं.
संविधान के 69वें संशोधन विधेयक के ज़रिए दिसंबर, 1991 में दिल्ली को आंशिक राज्य का दर्जा दिया गया है.
लेकिन संविधान के सातवें अनुच्छेद की धारा 1, 2 और 18 के तहत राज्य सरकार को मिलने वाले प्रशासन, पुलिस और ज़मीन के अधिकार को केंद्र सरकार ने अपने ही पास ही रखा था.
अभी मौजूदा स्थिति ये है कि अगर किसी मुद्दे पर पुलिस और प्रशासन की व्यवस्था में गड़बड़ी का माहौल बनता है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री बस कार्रवाई की मांग कर सकते हैं.
ऐसे में दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन तभी किया जा सकता है जब इससे संबंधित प्रस्ताव भारतीय संसद से पारित हो.
मौजूदा प्रावधानों के मुताबिक़, दिल्ली पुलिस स्थानीय विधायकों और दिल्ली सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं है.
केजरीवाल से पहले भी राज्य की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित भी दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन किए जाने की मांग करती रही थीं.
करीब 1.7 करोड़ की आबादी के लोगों को संभालने और उनकी समस्याओं के निदान के लिए पुलिस व्यवस्था को राज्य सरकार के तहत किए जाने की मांग को तर्क संगत बताया जाता रहा है.
Wednesday, February 13, 2019
Thursday, February 7, 2019
特朗普国情咨文演说:台湾人权工作者李明哲之妻李净瑜获邀出席
就在美国总统特朗普表示将很快再次与中国领导人习近平会面后不久,台湾非政府组织工作者李明哲之妻李净瑜,接受美国共和党联邦众议员史密斯(Chris Smith)邀请,出席特朗普的国情咨文演说(State of the Union address)。
李净瑜是历史上第一位出席美国总统国情咨文演讲的台湾人。她的丈夫、台湾非政府组织工作者李明哲因被判颠覆政权罪已在中国被囚一年多。
李明哲被认为是遭到中国大陆抓捕的台湾政治犯,相关事件一度引起全球媒体高度关注。BBC中文特別采访李净瑜以及人权活动人士杨宪宏,了解此次李净瑜参加国情咨文演说的前因后果,以及该案在中美台三角关系中扮演的角色。
1975年出生于台北市,李明哲於2017年3月从澳门前往珠海拜访友人后失踪,后来中国政府表示李明哲已经被逮捕。在2017年11月28日,中国法院以李明哲在通讯软体上与中国环境以及维权运动团体的交谈有“迟早会暴动”等话语,依“颠覆国家政权罪”判刑5年,褫夺政治权利2年,成为成为首位以此罪名入狱的台湾人。李明哲当庭表示不会上诉,目前关押在湖南省赤山监狱,成为国际媒体关心中国人权的重要案件之一。
综合相关媒体报导,李明哲妻子,同时也是研究台湾“白色恐怖”历史的人权活动家李净瑜,直到2018年3月才得以第一次探视到李明哲。
李净瑜亦公开表示拒绝接受与中国官方的交易以换取李明哲出狱回台。李净瑜於2018年12月24日在台湾举行记者会说明赤山监狱冻结李明哲帐户,使后者不能添购衣物与食物,要吃剩余的食物维生,健康状况极差。
李净瑜一年多前曾接受BBC中文采访说明,多年来,李明哲是透过QQ等社交软件,与中国大陆“大部分都是当地对国家充满热情的人士”结交朋友,分享经验。“因为父母来自中国大陆,李明哲自然也会关心中国大陆的民运发展”,李净瑜表示。
赤山监狱在李净瑜探监后,於2019年1月寄发“告知书”吿知李净瑜3个月内不得探监,中国国台办也随后批评李净瑜的行动有政治目的。
李净瑜与李明哲皆是台湾资深的社会运动人士,李明哲被捕后,李净瑜随即与许多人权团体譬如“台湾人权促进会”及“台湾关怀中国人权联盟”(TACHR)合作,展开密集救援活动。
李净瑜向BBC中文表示,此次会参与到特朗普政府的国情咨询,虽然不在她预期,但是向国际社会发声,请求协助,是自李明哲被中国政府逮捕后她一直在从事的工作。
“台湾关怀中国人权联盟”理事长,亦是台湾资深媒体人杨宪宏向BBC中文提及,这次李净瑜参加到此次咨询会,不是特別的意外。杨表示,该协会这两年来,都会固定参与特朗普政府的“早餐祈祷会”,并陆续与美国官员,包含这次邀请李净瑜的众议员,以及华盛顿特区的运动者等相关团体说明李明哲案件以及报告救援进度。
杨宪宏表示,认为美国官方以及民间组织十分关心也了解李明哲案之细节。李净瑜也向BBC中文说明,目前为止她在华府拜访会面的官员及团体,都对自己十分支持。
李净瑜向BBC中文阐释,此次在华府展开的国际救援,确实与美国开始关注台湾人权的处境相关,她同时赞成在台美关系进展的大背景下,美国官方就台湾面对中国的处境有重新的思考,譬如《台湾关系法》(Taiwan Relations Act)其中便提到,台湾人权遭受压迫时,美国必须要有所关切。
1979年,美国国会通过了《台湾关系法》,其中提到:“本法律的任何条款不得违反美国对人权的关切,尤其是对于台湾地区一千八百万名居民人权的关切。玆此重申维护及促进所有台湾人民的人权是美国的目标。” 或“指示总统如遇台湾人民的安全或社会经济制度遭受威胁,因而危及美国利益时,应迅速通知国会。总统和国会将依宪法程序,决定美国应付上述危险所应采取的适当行动。”等
李净瑜是历史上第一位出席美国总统国情咨文演讲的台湾人。她的丈夫、台湾非政府组织工作者李明哲因被判颠覆政权罪已在中国被囚一年多。
李明哲被认为是遭到中国大陆抓捕的台湾政治犯,相关事件一度引起全球媒体高度关注。BBC中文特別采访李净瑜以及人权活动人士杨宪宏,了解此次李净瑜参加国情咨文演说的前因后果,以及该案在中美台三角关系中扮演的角色。
1975年出生于台北市,李明哲於2017年3月从澳门前往珠海拜访友人后失踪,后来中国政府表示李明哲已经被逮捕。在2017年11月28日,中国法院以李明哲在通讯软体上与中国环境以及维权运动团体的交谈有“迟早会暴动”等话语,依“颠覆国家政权罪”判刑5年,褫夺政治权利2年,成为成为首位以此罪名入狱的台湾人。李明哲当庭表示不会上诉,目前关押在湖南省赤山监狱,成为国际媒体关心中国人权的重要案件之一。
综合相关媒体报导,李明哲妻子,同时也是研究台湾“白色恐怖”历史的人权活动家李净瑜,直到2018年3月才得以第一次探视到李明哲。
李净瑜亦公开表示拒绝接受与中国官方的交易以换取李明哲出狱回台。李净瑜於2018年12月24日在台湾举行记者会说明赤山监狱冻结李明哲帐户,使后者不能添购衣物与食物,要吃剩余的食物维生,健康状况极差。
李净瑜一年多前曾接受BBC中文采访说明,多年来,李明哲是透过QQ等社交软件,与中国大陆“大部分都是当地对国家充满热情的人士”结交朋友,分享经验。“因为父母来自中国大陆,李明哲自然也会关心中国大陆的民运发展”,李净瑜表示。
赤山监狱在李净瑜探监后,於2019年1月寄发“告知书”吿知李净瑜3个月内不得探监,中国国台办也随后批评李净瑜的行动有政治目的。
李净瑜与李明哲皆是台湾资深的社会运动人士,李明哲被捕后,李净瑜随即与许多人权团体譬如“台湾人权促进会”及“台湾关怀中国人权联盟”(TACHR)合作,展开密集救援活动。
李净瑜向BBC中文表示,此次会参与到特朗普政府的国情咨询,虽然不在她预期,但是向国际社会发声,请求协助,是自李明哲被中国政府逮捕后她一直在从事的工作。
“台湾关怀中国人权联盟”理事长,亦是台湾资深媒体人杨宪宏向BBC中文提及,这次李净瑜参加到此次咨询会,不是特別的意外。杨表示,该协会这两年来,都会固定参与特朗普政府的“早餐祈祷会”,并陆续与美国官员,包含这次邀请李净瑜的众议员,以及华盛顿特区的运动者等相关团体说明李明哲案件以及报告救援进度。
杨宪宏表示,认为美国官方以及民间组织十分关心也了解李明哲案之细节。李净瑜也向BBC中文说明,目前为止她在华府拜访会面的官员及团体,都对自己十分支持。
李净瑜向BBC中文阐释,此次在华府展开的国际救援,确实与美国开始关注台湾人权的处境相关,她同时赞成在台美关系进展的大背景下,美国官方就台湾面对中国的处境有重新的思考,譬如《台湾关系法》(Taiwan Relations Act)其中便提到,台湾人权遭受压迫时,美国必须要有所关切。
1979年,美国国会通过了《台湾关系法》,其中提到:“本法律的任何条款不得违反美国对人权的关切,尤其是对于台湾地区一千八百万名居民人权的关切。玆此重申维护及促进所有台湾人民的人权是美国的目标。” 或“指示总统如遇台湾人民的安全或社会经济制度遭受威胁,因而危及美国利益时,应迅速通知国会。总统和国会将依宪法程序,决定美国应付上述危险所应采取的适当行动。”等
Wednesday, February 6, 2019
राम मंदिर निर्माण मुद्दा 'ठंडे बस्ते' में क्यों?
पिछले कुछ महीने से पैतृक संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की आवाज़ में आवाज़ मिलाकर राम मंदिर निर्माण के लिए क़ानून की मांग कर रहे और इसके समर्थन में धर्म-सभाएं कर रहे विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर आंदोलन को लोकसभा चुनाव तक स्थगित करने की घोषणा की है.
हालांकि विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन बार-बार इस बात पर ज़ोर देते रहे कि 'आंदोलन स्थगित नहीं हुआ' बल्कि इसे सिर्फ़ अगले चार महीने न करने का निर्णय लिया गया है ताकि इसका राजनीतिकरण न हो सके.
साथ ही परिषद का मानना है कि 'सेक्युलर बिरादिरी को इस पवित्र आंदोलन को राजनीतिक दलदल में घसीटने का अवसर' न मिले इसलिए वह इसे स्थगित कर रहा है. इस बात का ज़िक्र कुंभ धर्मसंसद में राम जन्मभूमि पर एक फ़रवरी को पास हुए प्रस्ताव में भी है.
लेकिन कुंभ में और भी काफ़ी कुछ हुआ- 13 बड़े मठों से मिलकर बने अखाड़ा परिषद ने वीएचपी की धर्मसंसद का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया और ख़बरों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मान-मनौवल के बावजूद बहिष्कार ख़त्म न करने को तैयार हुए.
अखाड़ा परिषद के प्रमुख आचार्य नरेंद्र गिरि ने न सिर्फ़ राम मंदिर मामले में वीएचपी की भूमिका पर सवाल उठाया बल्कि केंद्र सरकार के उस क़दम का भी विरोध किया जिसमें ग़ैर-विवादित भूमि को न्यास को सौंपने की बात कही गई है. न्यास वीएचपी के अधीन है.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ नरेंद्र गिरि ने कहा, "केंद्र चार सालों तक चुप बैठा रहा और अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी डाली और आरोप लगाया कि राम मंदिर का इस्तेमाल राजनीतिक फ़ायदे के लिए किया जा रहा है."
अयोध्या द डार्क नाइट नामक किताब के सह-लेखक और वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र झा कहते हैं, "राम मंदिर निर्माण में बाधा को ख़त्म करने के नाम पर आरएसएस और वीएचपी ने जब क़ानून की मांग शुरू की थी तब उन्हें ये अंदाज़ा नहीं था कि पासा उल्टा पड़ जाएगा."
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पिछले दिनों अदालत में हो रही देरी की वजह से हिंदुओं के धैर्य समाप्त होने और जल्द से जल्द राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश या क़ानून लाने की मांग करते रहे हैं.
वीएचपी ने राम मंदिर को लेकर पिछले साल से चरणबद्ध तरीक़े से कार्यक्रम किया है.
लेकिन कई वर्गों से ये भी सवाल उठते रहे हैं कि बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार में आने पर मंदिर निर्माण का वादा करती रही है लेकिन चार सालों में इसे लेकर कोई बड़ा क़दम अब तक क्यों नहीं उठाया गया.
धीरेंद्र झा कहते हैं, "आरएसएस और वीएचपी अब ये सोच रही है कि राम मंदिर मामले को भूनाना तो मुश्किल दिख रहा है तो कम से कम बीजेपी को नुक़सान से बचा लिया जाए और इसी रणनीति के तहत आगे बढ़ा क़दम पीछे खींचा गया है."
हिंदुत्व संगठनों को क़रीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषक जगदीश उपासने का मानना है कि इसमें कोई रणनीति नहीं है और संघ चाहता है कि सारा मामला अदालत के माध्यम से तय हो.
वह इस संबंध में आरएसएस के सर-कार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी के उस बयान का हवाला देते हैं जिसमें कहा गया था कि राम मंदिर का निर्माण 2025 तक होगा.
सुरेंद्र जैन भी ज़ोर देकर कहते हैं कि बीजेपी को इस मुद्दे पर होने वाले फ़ायदे-नुक़सान से वीएचपी का कोई लेना-देना नहीं है लेकिन ये पूरा मामला बैकफ़ुट पर कैसे गया ये मोहन भागवत के भाषण से साफ़ हो जाता है.
धर्म-संसद में बोलते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था, "… उनको हमारे आंदोलन की कठिनाई नहीं होनी चाहिए, उनको मदद होनी चाहिए ऐसा ही हमको करना पड़ेगा."
हालांकि विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयुक्त महासचिव सुरेंद्र जैन बार-बार इस बात पर ज़ोर देते रहे कि 'आंदोलन स्थगित नहीं हुआ' बल्कि इसे सिर्फ़ अगले चार महीने न करने का निर्णय लिया गया है ताकि इसका राजनीतिकरण न हो सके.
साथ ही परिषद का मानना है कि 'सेक्युलर बिरादिरी को इस पवित्र आंदोलन को राजनीतिक दलदल में घसीटने का अवसर' न मिले इसलिए वह इसे स्थगित कर रहा है. इस बात का ज़िक्र कुंभ धर्मसंसद में राम जन्मभूमि पर एक फ़रवरी को पास हुए प्रस्ताव में भी है.
लेकिन कुंभ में और भी काफ़ी कुछ हुआ- 13 बड़े मठों से मिलकर बने अखाड़ा परिषद ने वीएचपी की धर्मसंसद का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया और ख़बरों के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मान-मनौवल के बावजूद बहिष्कार ख़त्म न करने को तैयार हुए.
अखाड़ा परिषद के प्रमुख आचार्य नरेंद्र गिरि ने न सिर्फ़ राम मंदिर मामले में वीएचपी की भूमिका पर सवाल उठाया बल्कि केंद्र सरकार के उस क़दम का भी विरोध किया जिसमें ग़ैर-विवादित भूमि को न्यास को सौंपने की बात कही गई है. न्यास वीएचपी के अधीन है.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ नरेंद्र गिरि ने कहा, "केंद्र चार सालों तक चुप बैठा रहा और अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अर्ज़ी डाली और आरोप लगाया कि राम मंदिर का इस्तेमाल राजनीतिक फ़ायदे के लिए किया जा रहा है."
अयोध्या द डार्क नाइट नामक किताब के सह-लेखक और वरिष्ठ पत्रकार धीरेंद्र झा कहते हैं, "राम मंदिर निर्माण में बाधा को ख़त्म करने के नाम पर आरएसएस और वीएचपी ने जब क़ानून की मांग शुरू की थी तब उन्हें ये अंदाज़ा नहीं था कि पासा उल्टा पड़ जाएगा."
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पिछले दिनों अदालत में हो रही देरी की वजह से हिंदुओं के धैर्य समाप्त होने और जल्द से जल्द राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश या क़ानून लाने की मांग करते रहे हैं.
वीएचपी ने राम मंदिर को लेकर पिछले साल से चरणबद्ध तरीक़े से कार्यक्रम किया है.
लेकिन कई वर्गों से ये भी सवाल उठते रहे हैं कि बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार में आने पर मंदिर निर्माण का वादा करती रही है लेकिन चार सालों में इसे लेकर कोई बड़ा क़दम अब तक क्यों नहीं उठाया गया.
धीरेंद्र झा कहते हैं, "आरएसएस और वीएचपी अब ये सोच रही है कि राम मंदिर मामले को भूनाना तो मुश्किल दिख रहा है तो कम से कम बीजेपी को नुक़सान से बचा लिया जाए और इसी रणनीति के तहत आगे बढ़ा क़दम पीछे खींचा गया है."
हिंदुत्व संगठनों को क़रीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषक जगदीश उपासने का मानना है कि इसमें कोई रणनीति नहीं है और संघ चाहता है कि सारा मामला अदालत के माध्यम से तय हो.
वह इस संबंध में आरएसएस के सर-कार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी के उस बयान का हवाला देते हैं जिसमें कहा गया था कि राम मंदिर का निर्माण 2025 तक होगा.
सुरेंद्र जैन भी ज़ोर देकर कहते हैं कि बीजेपी को इस मुद्दे पर होने वाले फ़ायदे-नुक़सान से वीएचपी का कोई लेना-देना नहीं है लेकिन ये पूरा मामला बैकफ़ुट पर कैसे गया ये मोहन भागवत के भाषण से साफ़ हो जाता है.
धर्म-संसद में बोलते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था, "… उनको हमारे आंदोलन की कठिनाई नहीं होनी चाहिए, उनको मदद होनी चाहिए ऐसा ही हमको करना पड़ेगा."
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